ऋग्वैदिक काल भारतीय प्राचीन इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है और Union Public Service Commission (संघ लोक सेवा आयोग) की प्रारंभिक परीक्षा में इससे नियमित रूप से प्रश्न पूछे जाते हैं। इस अध्याय से देवताओं का स्वरूप, सामाजिक संगठन, शासन व्यवस्था, आर्थिक जीवन, नदियाँ, वैदिक शब्दावली तथा प्रारंभिक वैचारिक धारणाओं से संबंधित तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
इन नोट्स में ऋग्वैदिक काल को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया गया है, ताकि अध्ययन सरल, तथ्य स्पष्ट और पुनरावृत्ति तीव्र हो सके। इसमें ऋग्वेद की संरचना, प्रमुख देवता, सभा और समिति, गाय का आर्थिक महत्व, जौ, निष्क, अयस, सप्तसिंधु, सरस्वती तथा परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले भ्रमकारी तथ्यों को संक्षिप्त किन्तु परीक्षा-केंद्रित रूप में व्यवस्थित किया गया है।
यह सामग्री विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के लिए उपयोगी है जो प्रारंभिक परीक्षा, राज्य लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन परीक्षा तथा अन्य सामान्य अध्ययन आधारित परीक्षाओं के लिए प्राचीन भारतीय इतिहास को मजबूत करना चाहते हैं।
ऋग्वेद का आधार
भारतीय इतिहास के प्रारंभिक वैदिक चरण को समझने के लिए ऋग्वेद सबसे महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। प्रारंभिक वैदिक समाज, धर्म, सामाजिक संगठन, प्राकृतिक दृष्टि, आरंभिक शासन और जीवन-पद्धति का सर्वाधिक प्रामाणिक ज्ञान इसी ग्रंथ से प्राप्त होता है। प्रारंभिक परीक्षा में इस भाग से अनेक प्रत्यक्ष प्रश्न पूछे जाते हैं, इसलिए इसके मूल तथ्यों को स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है।
ऋग्वेद का परिचय
ऋग्वेद वैदिक साहित्य का सबसे प्राचीन ग्रंथ माना जाता है। यह स्तुतियों, प्रार्थनाओं और मंत्रों का संग्रह है। इसमें मुख्यतः देवताओं की प्रशंसा, प्राकृतिक शक्तियों का वर्णन, समाज की स्थिति तथा मानव जीवन के प्रारंभिक विचारों का उल्लेख मिलता है।
“ऋक्” का अर्थ स्तुति है और “वेद” का अर्थ ज्ञान है। इस प्रकार ऋग्वेद का अर्थ हुआ — स्तुतियों का ज्ञान।
ऋग्वेद को वैदिक सभ्यता का सबसे प्राचीन उपलब्ध साहित्यिक स्रोत माना जाता है। इससे ज्ञात होता है कि उस समय समाज प्रकृति के निकट था और जीवन का केंद्र पशुपालन, यज्ञ तथा कबीलाई संगठन था।
वैदिक काल का विभाजन
वैदिक काल को सामान्यतः दो भागों में विभाजित किया जाता है:
1. ऋग्वैदिक काल
यह प्रारंभिक चरण है। इसमें समाज अपेक्षाकृत सरल, ग्रामीण और कबीलाई स्वरूप का था।
2. उत्तरवैदिक काल
इस चरण में कृषि का विस्तार, स्थायी निवास, सामाजिक विभाजन और राजसत्ता का विकास अधिक स्पष्ट हुआ।
ऋग्वैदिक काल का समय सामान्यतः लगभग पंद्रह सौ ईसा पूर्व से बारह सौ ईसा पूर्व के मध्य माना जाता है, जबकि उत्तरवैदिक काल उसके बाद विकसित हुआ।
प्रारंभिक परीक्षा में यह अंतर विशेष रूप से पूछा जाता है कि कौन-सी विशेषता प्रारंभिक वैदिक काल की है और कौन-सी उत्तरवैदिक काल की।
ऋग्वेद की संरचना
ऋग्वेद सुव्यवस्थित रूप से अनेक भागों में विभाजित है।
संरचनात्मक रूप
| घटक | संख्या |
|---|---|
| मंडल | 10 |
| सूक्त | 1028 |
| मंत्र | 10,552 |
संरचना का क्रम
मंत्र → सूक्त → मंडल
मंत्र सबसे छोटी इकाई है।
अनेक मंत्र मिलकर सूक्त बनाते हैं।
अनेक सूक्त मिलकर एक मंडल बनाते हैं।
मंडल
ऋग्वेद के दस मंडल हैं। प्रत्येक मंडल में विभिन्न ऋषियों द्वारा रचित सूक्त संकलित हैं।
सबसे प्राचीन मंडल
दूसरे से सातवें मंडल सबसे प्राचीन माने जाते हैं। इन्हें परिवार मंडल भी कहा जाता है क्योंकि इनका संबंध विशेष ऋषि कुलों से है।
नवीन मंडल
पहला, आठवाँ, नौवाँ और दसवाँ मंडल अपेक्षाकृत बाद के माने जाते हैं।
विशेष महत्व
नवाँ मंडल
पूरा का पूरा सोम देवता को समर्पित है।
दसवाँ मंडल
इसमें सामाजिक और दार्शनिक विचार अधिक मिलते हैं।
यहीं पुरुषसूक्त मिलता है, जिसमें चार वर्णों का उल्लेख है।
प्रमुख ऋषि और परिवार मंडल
| मंडल | संबंधित ऋषि |
|---|---|
| दूसरा | गृत्समद |
| तीसरा | विश्वामित्र |
| चौथा | वामदेव |
| पाँचवाँ | अत्रि |
| छठा | भारद्वाज |
| सातवाँ | वसिष्ठ |
इन मंडलों से प्रारंभिक वैदिक समाज की वास्तविक ऐतिहासिक जानकारी मिलती है।
प्रमुख सूक्त
ऋग्वेद के कुछ सूक्त प्रारंभिक परीक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
पुरुषसूक्त
दसवें मंडल में मिलता है।
चार वर्णों का उल्लेख यहीं मिलता है।
नासदीय सूक्त
सृष्टि की उत्पत्ति पर विचार करता है।
हिरण्यगर्भ सूक्त
सृष्टि की मूल शक्ति का वर्णन करता है।
नदी सूक्त
नदियों का उल्लेख मिलता है।
इस सूक्त में अनेक नदियों का क्रमबद्ध वर्णन है।
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ऋग्वेद के ऐतिहासिक स्रोत के रूप में महत्व
ऋग्वेद प्रारंभिक वैदिक काल का मुख्य साहित्यिक स्रोत है।
इससे जानकारी मिलती है:
- समाज
- धर्म
- शासन
- युद्ध
- पशुपालन
- नदियाँ
- जनजातियाँ
अन्य स्रोत सीमित हैं, इसलिए ऋग्वेद का महत्व अत्यधिक है।
सहायक स्रोत
| स्रोत | महत्व |
|---|---|
| पुरातात्त्विक प्रमाण | सीमित |
| अन्य वेद | बाद की स्थिति बताते हैं |
| बाहरी विवरण | उपलब्ध नहीं |
इसलिए प्रारंभिक वैदिक काल का अध्ययन मुख्यतः ऋग्वेद पर आधारित है।
मौखिक परंपरा
ऋग्वेद लंबे समय तक लिखित रूप में सुरक्षित नहीं था। इसे स्मरण परंपरा से पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित किया गया।
संरक्षण की प्रमुख विधियाँ
पदपाठ
शब्दों को अलग-अलग पढ़ना
संहितापाठ
शब्दों को जोड़कर पढ़ना
क्रमपाठ
क्रम में दोहराना
इसी कारण मंत्रों की शुद्धता बनी रही।
यह प्रारंभिक परीक्षा का अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है। 📌
आर्यों की उत्पत्ति संबंधी सिद्धांत
आर्य शब्द का अर्थ श्रेष्ठ या सभ्य माना जाता है। यह मूलतः सांस्कृतिक अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
प्रमुख सिद्धांत
मध्य एशिया सिद्धांत
सबसे अधिक स्वीकृत सिद्धांत
इसके अनुसार आर्य मध्य एशिया से भारत आए।
मुख्य आधार:
- भाषा की समानता
- घोड़े का महत्व
- रथ संस्कृति
भारतीय मूल सिद्धांत
कुछ विद्वानों ने आर्यों को भारत का मूल निवासी माना।
यूरोपीय सिद्धांत
अब कम मान्यता प्राप्त
आज अधिकांश इतिहासकार आर्यों के क्रमिक आगमन को स्वीकार करते हैं, आक्रमण को नहीं।
भारत में आर्यों का प्रवेश
आर्यों का प्रवेश उत्तर-पश्चिम दिशा से माना जाता है।
वे धीरे-धीरे नदियों के क्षेत्र में बसते गए।
उनका प्रारंभिक निवास क्षेत्र सप्तसिंधु माना गया।
सप्तसिंधु क्षेत्र
सप्तसिंधु का अर्थ सात नदियों का प्रदेश है।
यह प्रारंभिक वैदिक सभ्यता का मुख्य क्षेत्र था।
प्रमुख नदियाँ
- सिंधु
- झेलम
- चिनाब
- रावी
- ब्यास
- सतलुज
- सरस्वती
इनमें सरस्वती का विशेष महत्व था। ऋग्वेद में इसकी सर्वाधिक प्रशंसा मिलती है।
प्रारंभिक परीक्षा हेतु स्मरणीय तथ्य
✔ ऋग्वेद सबसे प्राचीन वैदिक ग्रंथ है
✔ इसमें 10 मंडल हैं
✔ 1028 सूक्त हैं
✔ दूसरे से सातवें मंडल परिवार मंडल हैं
✔ नवाँ मंडल सोम को समर्पित है
✔ पुरुषसूक्त दसवें मंडल में है
✔ सरस्वती सबसे अधिक प्रशंसित नदी है
✔ आर्यों का प्रारंभिक क्षेत्र सप्तसिंधु था
✔ ऋग्वेद मौखिक परंपरा से सुरक्षित रखा गया
ऋग्वैदिक धर्म
ऋग्वैदिक काल का धार्मिक जीवन प्रकृति पर आधारित था। उस समय मनुष्य ने प्रकृति की शक्तियों को देवतुल्य मानकर उनकी स्तुति की। आकाश, अग्नि, जल, वायु, वर्षा, प्रकाश और उषा जैसी शक्तियों को देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। ऋग्वेद में धार्मिक व्यवस्था सरल थी, मंदिरों और मूर्तियों का अभाव था, तथा यज्ञ धार्मिक जीवन का मुख्य आधार था। प्रारंभिक परीक्षा में इस भाग से अत्यधिक प्रश्न पूछे जाते हैं, इसलिए प्रत्येक देवता और उससे जुड़े सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है।
देवताओं का वर्गीकरण
ऋग्वेद में देवताओं को सामान्यतः तीन स्तरों में रखा गया है।
1. आकाशीय देवता
ये वे देवता हैं जिनका संबंध आकाश या ऊपरी प्राकृतिक शक्तियों से है।
- द्यौस
- वरुण
- मित्र
- सूर्य
- उषा
2. अंतरिक्षीय देवता
ये वायु, बादल, वर्षा और आंधी से संबंधित देवता हैं।
- इंद्र
- मरुत
- रुद्र
- पर्जन्य
3. स्थलीय देवता
इनका संबंध पृथ्वी और अग्नि से है।
- अग्नि
- पृथ्वी
- सोम
इस वर्गीकरण से स्पष्ट होता है कि धार्मिक जीवन प्रकृति के प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित था।
इंद्र
ऋग्वेद में इंद्र सबसे प्रमुख देवता हैं। इनके लिए सर्वाधिक मंत्र रचे गए हैं।
इंद्र की मुख्य विशेषताएँ
- वर्षा के देवता
- युद्ध के देवता
- वीरता के प्रतीक
- शत्रु-विजेता
इंद्र को वज्रधारी कहा गया है।
उन्होंने वृत्र नामक दैत्य का वध किया और जल को मुक्त कराया।
यह घटना वर्षा और बादलों के मुक्त होने का प्रतीक मानी जाती है।
परीक्षा हेतु तथ्य
✔ ऋग्वेद में सर्वाधिक स्तुतियाँ इंद्र को समर्पित हैं
✔ इंद्र को पुरंदर कहा गया है
✔ पुरंदर का अर्थ दुर्गों को नष्ट करने वाला
अग्नि
अग्नि ऋग्वेद के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण देवता हैं।
अग्नि को देवताओं और मनुष्यों के बीच दूत माना गया।
अग्नि का महत्व
- यज्ञ का माध्यम
- आहुति पहुँचाने वाला
- गृहस्थ जीवन का केंद्र
ऋग्वेद का पहला मंत्र अग्नि को समर्पित है।
इससे अग्नि की महत्ता स्पष्ट होती है।
परीक्षा हेतु तथ्य
✔ ऋग्वेद का प्रारंभ अग्नि स्तुति से होता है
✔ अग्नि को यज्ञवाहक कहा गया है
वरुण
वरुण नैतिक व्यवस्था और ब्रह्मांडीय नियम के देवता माने जाते हैं।
इनका संबंध जल और नैतिक अनुशासन दोनों से है।
मुख्य विशेषताएँ
- ऋत के रक्षक
- सत्य के संरक्षक
- दैवी व्यवस्था के नियंत्रक
वरुण का स्वरूप गंभीर और अनुशासनकारी माना गया।
परीक्षा हेतु तथ्य
✔ ऋत की रक्षा का कार्य वरुण से जुड़ा है
सोम
सोम देवता भी हैं और एक विशेष यज्ञीय पेय भी।
विशेषताएँ
- ऊर्जा देने वाला
- देवताओं का प्रिय पेय
- यज्ञ में उपयोगी
ऋग्वेद का नवाँ मंडल पूर्णतः सोम को समर्पित है।
परीक्षा हेतु तथ्य
✔ नवाँ मंडल सोम प्रधान है
मरुत
मरुत वायु, तूफान और गर्जना से जुड़े देवता हैं।
इन्हें इंद्र के सहायक माना गया।
विशेषताएँ
- तेज गति
- युद्धप्रिय स्वरूप
- बादलों की शक्ति का प्रतीक
उषा
उषा प्रातःकाल की देवी हैं।
ऋग्वेद में उषा का वर्णन अत्यंत सुंदर काव्यात्मक शैली में हुआ है।
विशेषताएँ
- प्रकाश का आगमन
- अंधकार का अंत
- नवीनता का प्रतीक
अश्विन
अश्विन जुड़वाँ देवता माने जाते हैं।
इनका संबंध स्वास्थ्य और उपचार से है।
विशेषताएँ
- रोग निवारण
- तीव्र गति
- सहायता देने वाले देवता
यज्ञ प्रणाली
ऋग्वैदिक धर्म में यज्ञ धार्मिक जीवन का मुख्य केंद्र था।
उस समय यज्ञ सरल थे और अत्यधिक जटिल नहीं थे।
यज्ञ का उद्देश्य
- देवताओं को प्रसन्न करना
- वर्षा की कामना
- पशुधन की वृद्धि
- विजय की इच्छा
यज्ञ की प्रमुख सामग्री
- घृत
- अन्न
- सोम
- दुग्ध
विशेष तथ्य
मंदिर और मूर्ति पूजा का अभाव था।
ऋत
ऋत ऋग्वैदिक धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
अर्थ
सृष्टि की नियमित व्यवस्था
यह प्राकृतिक, नैतिक और ब्रह्मांडीय नियम का संकेत करता है।
सूर्य का उदय, ऋतुओं का परिवर्तन, जल का प्रवाह — सब ऋत के अंतर्गत समझे जाते थे।
संबंधित देवता
वरुण को ऋत का रक्षक माना गया।
परीक्षा हेतु तथ्य
✔ ऋत = ब्रह्मांडीय व्यवस्था
सत्य
सत्य का अर्थ केवल कथन की सत्यता नहीं था, बल्कि सही आचरण भी था।
ऋत और सत्य परस्पर जुड़े हुए माने गए।
अंतर
- ऋत = सार्वभौमिक व्यवस्था
- सत्य = मानव व्यवहार में उसका पालन
दान
ऋग्वैदिक समाज में दान को धार्मिक महत्व प्राप्त था।
दान का स्वरूप
- गौदान
- अश्वदान
- अन्नदान
दान देने वाला प्रतिष्ठित माना जाता था।
ऋषियों को दान देने की परंपरा थी।
प्रारंभिक दर्शन
ऋग्वैदिक धर्म में दार्शनिक विचारों के प्रारंभिक संकेत मिलते हैं।
मुख्य विचार
- सृष्टि की उत्पत्ति
- देवताओं की मूल शक्ति
- जगत की रचना
नासदीय सूक्त
इसमें सृष्टि के आरंभ पर प्रश्न उठाया गया है।
यह अत्यंत उच्च विचारधारा का उदाहरण है।
हिरण्यगर्भ विचार
सृष्टि की मूल सत्ता का संकेत देता है।
प्रारंभिक परीक्षा हेतु स्मरणीय तथ्य
✔ इंद्र सबसे प्रमुख देवता हैं
✔ अग्नि दूसरे प्रमुख देवता हैं
✔ वरुण ऋत के रक्षक हैं
✔ सोम देवता और पेय दोनों हैं
✔ मरुत वायु और तूफान से जुड़े हैं
✔ उषा प्रातःकाल की देवी हैं
✔ अश्विन चिकित्सा से जुड़े हैं
✔ यज्ञ धार्मिक जीवन का केंद्र था
✔ ऋत = ब्रह्मांडीय व्यवस्था
✔ सत्य = आचरण में व्यवस्था का पालन
ऋग्वैदिक समाज
ऋग्वैदिक काल का समाज अपेक्षाकृत सरल, गतिशील और जनजातीय स्वरूप का था। सामाजिक संगठन परिवार से प्रारंभ होकर बड़े समूहों तक विस्तृत था। उस समय सामाजिक संबंध रक्त-संबंध, पशुधन, युद्ध, सहयोग और धार्मिक जीवन पर आधारित थे। प्रारंभिक परीक्षा में इस भाग से अनेक प्रत्यक्ष तथा तुलना आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं, इसलिए सामाजिक इकाइयों और सामाजिक व्यवस्था को स्पष्ट रूप से समझना अत्यंत आवश्यक है।
सामाजिक इकाइयाँ
ऋग्वैदिक समाज क्रमबद्ध सामाजिक इकाइयों में संगठित था। छोटी इकाई से बड़ी इकाई तक समाज का विस्तार इस प्रकार था:
क्रम
कुल → ग्राम → विश → जन
यह क्रम प्रारंभिक परीक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कुल
कुल समाज की सबसे छोटी इकाई थी।
विशेषताएँ
- अनेक सदस्य एक ही परिवार में रहते थे
- परिवार का नेतृत्व सबसे वृद्ध पुरुष करता था
- संपत्ति, पशुधन और धार्मिक कार्य सामूहिक रूप से संचालित होते थे
परिवार पितृसत्तात्मक था।
कुल का प्रमुख
कुलपति
कुलपति परिवार का मार्गदर्शन करता था।
ग्राम
अनेक कुल मिलकर ग्राम बनाते थे।
विशेषताएँ
- ग्राम स्थायी या अर्धस्थायी निवास का केंद्र था
- पशुपालन और कृषि दोनों का प्रारंभिक रूप यहाँ दिखाई देता है
- सुरक्षा और सहयोग का सामूहिक स्वरूप था
ग्राम का प्रमुख
ग्रामणी
ग्रामणी प्रशासन और सुरक्षा से जुड़ा प्रमुख व्यक्ति था।
परीक्षा हेतु तथ्य
✔ ग्रामणी शब्द प्रारंभिक वैदिक प्रशासन में महत्वपूर्ण है
विश
अनेक ग्राम मिलकर विश बनाते थे।
विश को सामान्य जनता या व्यापक सामाजिक समूह के रूप में समझा जाता है।
विशेषताएँ
- यह एक बड़ा सामाजिक समुदाय था
- उत्पादन और युद्ध दोनों में इसकी भूमिका थी
कुछ विद्वान विश को जनसाधारण भी मानते हैं।
जन
जन सबसे बड़ी सामाजिक इकाई थी।
विशेषताएँ
- अनेक विश मिलकर जन बनाते थे
- यह जनजातीय संगठन था
- एक जन का अपना नेतृत्व और पहचान होती थी
उदाहरण के रूप में विभिन्न जनों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।
जन का प्रमुख
राजन्
राजन् जन का संरक्षक था, पूर्ण राजा जैसा केंद्रीकृत शासक नहीं।
वर्ण व्यवस्था
ऋग्वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था प्रारंभिक अवस्था में थी।
मुख्य विशेषता
यह जन्म पर पूरी तरह आधारित नहीं थी।
प्रारंभिक चार वर्ण
- ब्राह्मण
- क्षत्रिय
- वैश्य
- शूद्र
इनका स्पष्ट उल्लेख पुरुषसूक्त में मिलता है।
महत्वपूर्ण तथ्य
पुरुषसूक्त ऋग्वेद के दसवें मंडल में है, जो अपेक्षाकृत बाद का भाग माना जाता है।
इससे संकेत मिलता है कि प्रारंभिक ऋग्वैदिक समाज में वर्ण व्यवस्था कठोर नहीं थी।
परीक्षा हेतु तथ्य
✔ प्रारंभिक वैदिक समाज में सामाजिक गतिशीलता थी
✔ व्यवसाय परिवर्तन संभव था
स्त्रियों की स्थिति
ऋग्वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति सम्मानजनक मानी जाती है।
प्रमुख अधिकार
- धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता
- शिक्षा प्राप्त करने का अवसर
- सभा में उपस्थिति
- वैचारिक अभिव्यक्ति
विदुषी स्त्रियाँ
लोपामुद्रा
घोषा
अपाला
इन स्त्रियों द्वारा मंत्र रचना का उल्लेख मिलता है।
परीक्षा हेतु तथ्य
स्त्रियाँ वैदिक मंत्रों की रचयिता भी थीं
विवाह
ऋग्वैदिक समाज में विवाह सामाजिक संस्था के रूप में स्थापित था।
प्रमुख विशेषताएँ
- एक पत्नी प्रथा सामान्य थी
- विवाह धार्मिक संस्कार माना जाता था
- परिवार निर्माण इसका मुख्य उद्देश्य था
विवाह की स्वतंत्रता
कुछ सीमा तक वरण का अधिकार उपलब्ध था।
विधवा विवाह
कई संकेत बताते हैं कि विधवा विवाह निषिद्ध नहीं था।
परिवार
परिवार समाज का मुख्य आधार था।
विशेषताएँ
- संयुक्त परिवार प्रचलित था
- पिता परिवार का प्रमुख था
- पुत्र को वंश परंपरा का वाहक माना जाता था
परिवार में स्त्री की भूमिका
- गृह संचालन
- धार्मिक कार्यों में सहभागिता
- आर्थिक सहयोग
नियोग
नियोग ऐसी व्यवस्था थी जिसमें संतान प्राप्ति के उद्देश्य से विशेष सामाजिक अनुमति दी जाती थी।
उद्देश्य
वंश की निरंतरता बनाए रखना
विशेषता
यदि पति संतान उत्पन्न करने में असमर्थ हो या मृत्यु हो जाए, तो सीमित सामाजिक स्वीकृति के साथ यह व्यवस्था संभव थी।
यह प्रारंभिक वैदिक समाज की व्यावहारिक सामाजिक व्यवस्था को दर्शाता है।
आश्रम व्यवस्था
ऋग्वैदिक काल में पूर्ण विकसित आश्रम व्यवस्था नहीं मिलती।
महत्वपूर्ण तथ्य
चार आश्रमों की स्पष्ट व्यवस्था बाद के वैदिक और उत्तरवर्ती ग्रंथों में विकसित हुई।
चार आश्रम हैं:
- ब्रह्मचर्य
- गृहस्थ
- वानप्रस्थ
- संन्यास
परीक्षा हेतु तथ्य
ऋग्वैदिक काल में आश्रम व्यवस्था पूर्ण रूप में विकसित नहीं थी
सामाजिक जीवन की अन्य विशेषताएँ
भोजन
- जौ प्रमुख था
- दुग्ध उत्पादों का उपयोग
- पशु उत्पादों का महत्व
वस्त्र
- ऊन और सूत का प्रयोग
मनोरंजन
- गीत
- नृत्य
- रथ दौड़
प्रारंभिक परीक्षा हेतु स्मरणीय तथ्य
✔ सामाजिक इकाइयों का क्रम: कुल → ग्राम → विश → जन
✔ ग्राम का प्रमुख ग्रामणी था
✔ जन का प्रमुख राजन् था
✔ वर्ण व्यवस्था कठोर नहीं थी
✔ स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार था
✔ विदुषी स्त्रियाँ मंत्र रचती थीं
✔ विवाह धार्मिक संस्था था
✔ नियोग का उद्देश्य वंश रक्षा था
✔ आश्रम व्यवस्था पूर्ण विकसित नहीं थी
शासन व्यवस्था
ऋग्वैदिक काल की शासन व्यवस्था पूर्ण विकसित राजतंत्र नहीं थी, बल्कि जनजातीय नेतृत्व पर आधारित व्यवस्था थी। उस समय राजा का स्थान महत्वपूर्ण था, परंतु वह निरंकुश शासक नहीं था। शासन में विभिन्न संस्थाओं और पदाधिकारियों की भूमिका थी। प्रारंभिक परीक्षा में इस भाग से प्रत्यक्ष प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं, विशेषकर सभा, समिति, राजा तथा दाशराज्ञ युद्ध से जुड़े तथ्य।
राजा
राजा जन का प्रमुख होता था।
राजा की मुख्य विशेषताएँ
- वह जनजाति का संरक्षक था
- युद्ध में नेतृत्व करता था
- पशुधन और क्षेत्र की रक्षा करता था
- धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेता था
ऋग्वैदिक काल का राजा पूर्ण सम्राट नहीं था, बल्कि सीमित अधिकारों वाला प्रमुख था।
महत्वपूर्ण तथ्य
राजपद सामान्यतः वंशानुगत होता था, परंतु जन की स्वीकृति भी महत्व रखती थी।
राजा के लिए प्रयुक्त शब्द
राजन्
सभा
सभा एक महत्वपूर्ण परामर्श संस्था थी।
विशेषताएँ
- इसमें प्रमुख और वरिष्ठ लोग भाग लेते थे
- निर्णयों में सलाह दी जाती थी
- सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर विचार होता था
सभा अपेक्षाकृत छोटे और प्रभावशाली समूह की संस्था थी।
परीक्षा हेतु तथ्य
सभा में वरिष्ठ और प्रभावशाली लोग सम्मिलित होते थे
समिति
समिति अधिक व्यापक संस्था थी।
विशेषताएँ
- इसमें सामान्य जन की भागीदारी अधिक थी
- राजा के चयन या समर्थन में भूमिका हो सकती थी
- युद्ध और सार्वजनिक विषयों पर विचार होता था
सभा और समिति में अंतर
| संस्था | स्वरूप |
|---|---|
| सभा | सीमित, वरिष्ठ वर्ग |
| समिति | व्यापक जन सहभागिता |
परीक्षा हेतु तथ्य
समिति को अधिक जनाधारित संस्था माना जाता है
पुरोहित
पुरोहित शासन व्यवस्था में अत्यंत प्रभावशाली पद था।
मुख्य कार्य
- यज्ञ कराना
- धार्मिक मार्गदर्शन देना
- राजा को सलाह देना
- युद्ध से पूर्व मंत्रोच्चार करना
राजा और पुरोहित का संबंध निकट था।
प्रमुख पुरोहित
वशिष्ठ
विश्वामित्र
दाशराज्ञ युद्ध में इन दोनों का उल्लेख विशेष रूप से मिलता है।
सेनानी
सेनानी सेना का प्रमुख अधिकारी था।
कार्य
- युद्ध संचालन
- सैनिकों का नेतृत्व
- रक्षा व्यवस्था
राजा के बाद युद्ध क्षेत्र में सेनानी का महत्व था।
ग्रामणी
ग्रामणी ग्राम का प्रमुख था।
कार्य
- ग्राम प्रशासन
- सुरक्षा
- संगठन
- जनसंपर्क
कुछ विद्वान इसे सैनिक नेतृत्व से भी जोड़ते हैं।
बलि कर
ऋग्वैदिक काल में कर व्यवस्था प्रारंभिक अवस्था में थी।
बलि का अर्थ
राजा को स्वेच्छा से दिया जाने वाला अंश
स्वरूप
- अन्न
- पशु
- अन्य उपज
यह आधुनिक अर्थ में नियमित कर नहीं था।
परीक्षा हेतु तथ्य
बलि स्वैच्छिक अर्पण के रूप में माना जाता है
न्याय व्यवस्था
न्याय व्यवस्था सरल थी।
आधार
- परंपरा
- सामाजिक मान्यता
- बुजुर्गों की राय
राजा अंतिम निर्णय दे सकता था, परंतु सामुदायिक निर्णय भी महत्वपूर्ण थे।
दंड
- क्षतिपूर्ति
- सामाजिक दंड
कठोर विधिक संहिता विकसित नहीं थी।
दाशराज्ञ युद्ध
दाशराज्ञ युद्ध ऋग्वैदिक काल की अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है।
अर्थ
दस राजाओं का युद्ध
मुख्य पक्ष
सुदास ने अनेक विरोधी जनों को पराजित किया।
नदी
यह युद्ध परुष्णी नदी (रावी नदी) के निकट हुआ माना जाता है।
महत्व
- जनों के बीच संघर्ष
- नेतृत्व की स्थापना
- राजनीतिक शक्ति का संकेत
परीक्षा हेतु तथ्य
सुदास विजयी रहा
वसिष्ठ उसका पुरोहित था
सेना
ऋग्वैदिक सेना स्थायी सेना नहीं थी।
विशेषताएँ
- आवश्यकता पड़ने पर संगठन
- जनजातीय योद्धा
- पशुधन रक्षा प्रमुख उद्देश्य
हथियार
- धनुष
- बाण
- भाला
- गदा
रथ
रथ युद्ध का अत्यंत महत्वपूर्ण साधन था।
विशेषताएँ
- घोड़ों द्वारा चलाया जाता था
- युद्ध में गति प्रदान करता था
- प्रतिष्ठा का प्रतीक भी था
परीक्षा हेतु तथ्य
रथ संस्कृति ऋग्वैदिक समाज की विशेष पहचान है
दुर्ग
दुर्ग शब्द का उल्लेख मिलता है, परंतु विशाल पक्के दुर्गों का स्पष्ट प्रमाण नहीं है।
विशेषता
संरक्षण हेतु अस्थायी सुरक्षा स्थल
इंद्र को पुरंदर कहा गया क्योंकि वह दुर्गों को नष्ट करने वाला माना गया।
परीक्षा हेतु तथ्य
पुरंदर = दुर्ग विनाशक
प्रारंभिक परीक्षा हेतु स्मरणीय तथ्य
✔ राजा को राजन् कहा जाता था
✔ सभा वरिष्ठों की संस्था थी
✔ समिति व्यापक संस्था थी
✔ पुरोहित का प्रभाव अत्यधिक था
✔ सेनानी सेना का प्रमुख था
✔ ग्रामणी ग्राम प्रमुख था
✔ बलि स्वैच्छिक अर्पण था
✔ दाशराज्ञ युद्ध में सुदास विजयी रहा
✔ रथ युद्ध का मुख्य साधन था
✔ इंद्र को पुरंदर कहा गया
अर्थव्यवस्था
ऋग्वैदिक काल की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार पशुपालन था। कृषि का ज्ञान था, परंतु वह प्रारंभिक अवस्था में थी। धन, प्रतिष्ठा और सामाजिक शक्ति का प्रमुख माप पशुधन माना जाता था। व्यापार सीमित था, विनिमय की परंपरा विद्यमान थी, और शिल्पकर्म भी आरंभिक रूप में विकसित था। प्रारंभिक परीक्षा में इस भाग से विशेष रूप से गाय, जौ, निष्क तथा अयस से जुड़े प्रश्न पूछे जाते हैं। 📚
पशुपालन
ऋग्वैदिक अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण आधार पशुपालन था।
प्रमुख पाले जाने वाले पशु
- गाय
- बैल
- घोड़ा
- बकरी
- भेड़
पशुधन को धन का मुख्य रूप माना जाता था।
पशुपालन का महत्व
- भोजन का स्रोत
- यज्ञ में उपयोग
- विनिमय का माध्यम
- सामाजिक प्रतिष्ठा
युद्ध और पशुधन
अनेक संघर्ष पशुधन प्राप्त करने के लिए होते थे।
“गविष्टि” शब्द का अर्थ गायों के लिए संघर्ष या युद्ध माना जाता है।
परीक्षा हेतु तथ्य
✔ गविष्टि = गायों हेतु संघर्ष
गाय का महत्व
गाय ऋग्वैदिक समाज की सबसे मूल्यवान संपत्ति थी।
महत्व
- धन का माप
- दान का प्रमुख रूप
- दुग्ध का स्रोत
- धार्मिक महत्व
समृद्ध व्यक्ति वही माना जाता था जिसके पास अधिक गौधन हो।
विशेष तथ्य
गाय को “अघ्न्या” कहा गया, अर्थात जिसे मारना उचित न हो।
परीक्षा हेतु तथ्य
गाय आर्थिक और सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार थी
कृषि
ऋग्वैदिक काल में कृषि का ज्ञान था, किंतु पशुपालन की तुलना में इसका महत्व कम था।
प्रमुख विशेषताएँ
- हल चलाने का ज्ञान
- वर्षा पर निर्भर खेती
- सीमित कृषि क्षेत्र
कृषि धीरे-धीरे महत्व प्राप्त कर रही थी।
कृषि से जुड़े शब्द
- हल
- बीज
- खेत
जौ
जौ ऋग्वैदिक काल की प्रमुख फसल थी।
महत्व
- भोजन का मुख्य स्रोत
- यज्ञ में उपयोग
- दैनिक जीवन में प्रयोग
ऋग्वेद में जौ का उल्लेख बार-बार मिलता है।
विशेष तथ्य
चावल का स्पष्ट महत्व बाद के काल में अधिक दिखाई देता है।
परीक्षा हेतु तथ्य
जौ प्रारंभिक वैदिक काल की मुख्य फसल थी
व्यापार
ऋग्वैदिक काल में व्यापार सीमित रूप में विद्यमान था।
स्वरूप
- वस्तु विनिमय
- पशुधन आधारित लेन-देन
- स्थानीय आदान-प्रदान
व्यापारिक वस्तुएँ
- पशु
- धातु
- वस्त्र
- अन्न
व्यापारी
कुछ स्थलों पर व्यापारी वर्ग का संकेत मिलता है।
निष्क
निष्क ऋग्वैदिक अर्थव्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द है।
स्वरूप
- धातु का आभूषण
- मूल्य की इकाई के रूप में उपयोग
विशेष तथ्य
निष्क को आधुनिक सिक्के के समान नहीं माना जाना चाहिए।
यह प्रायः गले में धारण किया जाने वाला धातु आभूषण था, जिसका मूल्य भी था।
परीक्षा हेतु तथ्य
निष्क = आभूषण + मूल्य इकाई
शिल्प
ऋग्वैदिक समाज में शिल्पकर्म प्रारंभिक अवस्था में था।
प्रमुख शिल्प
- बढ़ई कार्य
- रथ निर्माण
- धातु कार्य
- वस्त्र निर्माण
बढ़ई का महत्व
रथ निर्माण के कारण बढ़ई का विशेष महत्व था।
अयस
अयस शब्द ऋग्वेद में धातु के लिए प्रयुक्त हुआ है।
महत्वपूर्ण तथ्य
ऋग्वैदिक काल में अयस का अर्थ सामान्यतः ताम्र या कांस्य माना जाता है।
सावधानी
इसे सीधे लोहे के अर्थ में नहीं लेना चाहिए।
लोहे का स्पष्ट व्यापक उपयोग उत्तरवैदिक काल में मिलता है।
परीक्षा हेतु तथ्य
प्रारंभिक वैदिक अयस = ताम्र/कांस्य
धातुएँ
ऋग्वैदिक समाज को कुछ धातुओं का ज्ञान था।
ज्ञात धातुएँ
- स्वर्ण
- ताम्र
- कांस्य
स्वर्ण का उपयोग
- आभूषण
- प्रतिष्ठा
धातुओं का उपयोग
- अलंकरण
- उपकरण
- यज्ञीय सामग्री
विशेष तथ्य
लोहे का व्यापक उपयोग इस काल में नहीं मिलता।
आर्थिक जीवन की अन्य विशेषताएँ
घोड़े का महत्व
- युद्ध
- रथ
- प्रतिष्ठा
बैल
- कृषि कार्य
- भार वहन
प्रारंभिक परीक्षा हेतु स्मरणीय तथ्य
✔ पशुपालन अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था
✔ गाय सबसे मूल्यवान संपत्ति थी
✔ गविष्टि = गायों हेतु संघर्ष
✔ जौ मुख्य फसल थी
✔ व्यापार वस्तु विनिमय पर आधारित था
✔ निष्क सिक्का नहीं, मूल्यवान आभूषण था
✔ अयस का अर्थ ताम्र या कांस्य है
✔ लोहे का व्यापक उपयोग बाद में हुआ
शिक्षा, संस्कृति, तुलना और निष्कर्ष
ऋग्वैदिक काल केवल धार्मिक या राजनीतिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि शिक्षा, संस्कृति, जीवन शैली और सामाजिक विचारों के कारण भी भारतीय इतिहास में इसका विशेष स्थान है। इस भाग से प्रारंभिक परीक्षा में प्रत्यक्ष तथ्य, तुलना आधारित प्रश्न तथा कथन-आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं। इसलिए शिक्षा व्यवस्था, सांस्कृतिक जीवन और अन्य सभ्यताओं से तुलना को स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है।
गुरुकुल
ऋग्वैदिक काल में शिक्षा का मुख्य केंद्र गुरुकुल व्यवस्था थी।
गुरुकुल की मुख्य विशेषताएँ
- विद्यार्थी गुरु के समीप रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे
- शिक्षा मौखिक रूप में दी जाती थी
- स्मरण शक्ति का विशेष महत्व था
- अनुशासन और सेवा शिक्षा का भाग थे
शिक्षा का उद्देश्य
- ज्ञान अर्जन
- धार्मिक मंत्रों का स्मरण
- आचरण निर्माण
शिक्षा
शिक्षा मुख्यतः श्रुति पर आधारित थी।
शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ
- सुनकर सीखना
- दोहराव द्वारा स्मरण
- उच्चारण की शुद्धता पर बल
पढ़ाए जाने वाले विषय
- मंत्र
- यज्ञ संबंधी ज्ञान
- आचरण
- प्राकृतिक ज्ञान
विशेष तथ्य
लिखित पद्धति का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता।
परीक्षा हेतु तथ्य
✔ शिक्षा मौखिक थी
✔ स्मरण पर अत्यधिक बल था
छंद
ऋग्वैदिक मंत्र छंदों में रचे गए हैं।
प्रमुख छंद
- गायत्री
- त्रिष्टुप
- जगती
विशेष महत्व
गायत्री छंद अत्यंत प्रसिद्ध है।
परीक्षा हेतु तथ्य
✔ वैदिक मंत्रों का रचनात्मक आधार छंद है
संगीत
ऋग्वैदिक समाज में संगीत का प्रारंभिक रूप विद्यमान था।
मुख्य स्वरूप
- मंत्रों का स्वर सहित पाठ
- सामूहिक स्तुति
- धार्मिक अनुष्ठानों में ध्वनि का उपयोग
विशेष तथ्य
बाद में सामवेद में संगीत अधिक विकसित रूप में मिलता है।
जीवन शैली
ऋग्वैदिक जीवन अपेक्षाकृत सरल और प्रकृति से निकट था।
मुख्य विशेषताएँ
- ग्राम आधारित जीवन
- पशुपालन प्रधान जीवन
- खुला सामाजिक संपर्क
निवास
- लकड़ी
- घास
- मिट्टी से बने घर
भोजन
ऋग्वैदिक समाज का भोजन प्राकृतिक और सरल था।
प्रमुख खाद्य पदार्थ
- जौ
- दुग्ध
- दही
- घृत
- फल
पेय
- सोम
- दुग्ध पेय
विशेष तथ्य
मांसाहार के संकेत भी कुछ स्थलों पर मिलते हैं।
चिकित्सा
ऋग्वैदिक समाज को रोग और उपचार का प्रारंभिक ज्ञान था।
उपचार के साधन
- औषधीय वनस्पतियाँ
- मंत्र
- प्राकृतिक उपचार
संबंधित देवता
अश्विन चिकित्सा से जुड़े माने जाते हैं।
पर्यावरण
ऋग्वैदिक समाज प्रकृति के अत्यंत निकट था।
प्रकृति का महत्व
- नदियाँ
- वर्षा
- अग्नि
- वायु
- सूर्य
पर्यावरणीय दृष्टि
प्राकृतिक शक्तियों को देवत्व दिया गया।
इससे प्रकृति के प्रति सम्मान स्पष्ट होता है।
हड़प्पा से तुलना
| आधार | हड़प्पा | ऋग्वैदिक |
|---|---|---|
| नगर व्यवस्था | विकसित | ग्राम प्रधान |
| लेखन | उपलब्ध | स्पष्ट प्रमाण नहीं |
| अर्थव्यवस्था | व्यापार प्रधान | पशुपालन प्रधान |
| धर्म | मूर्ति संकेत | प्रकृति उपासना |
| धातु | कांस्य प्रधान | ताम्र/कांस्य ज्ञान |
परीक्षा हेतु तथ्य
हड़प्पा नगरीय थी
ऋग्वैदिक समाज ग्रामप्रधान था
उत्तरवैदिक से तुलना
| आधार | ऋग्वैदिक | उत्तरवैदिक |
|---|---|---|
| समाज | सरल | अधिक जटिल |
| कृषि | सीमित | विस्तृत |
| वर्ण व्यवस्था | लचीली | कठोर |
| राज्य | जन आधारित | शक्तिशाली राजतंत्र |
| धातु | ताम्र/कांस्य | लोहे का विस्तार |
परीक्षा हेतु तथ्य
लोहे का व्यापक उपयोग उत्तरवैदिक काल में मिलता है
प्रारंभिक परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
✔ शिक्षा मौखिक थी
✔ गुरुकुल प्रमुख व्यवस्था थी
✔ गायत्री प्रमुख छंद है
✔ जीवन ग्राम आधारित था
✔ जौ मुख्य खाद्य था
✔ चिकित्सा में वनस्पति उपयोग थी
✔ हड़प्पा में लेखन था, ऋग्वैदिक में स्पष्ट नहीं
✔ उत्तरवैदिक में वर्ण व्यवस्था कठोर हुई
नीचे पूरे नोट्स के अनुरूप ऐसा अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) खंड दिया जा रहा है जो विषयवस्तु के साथ-साथ खोज परिणामों में उपयोगी लंबी खोज पंक्तियों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इसमें प्रश्न ऐसे रखे गए हैं जिन्हें विद्यार्थी सामान्यतः खोजते हैं और जिनसे लेख की विषयगत प्रासंगिकता बढ़ती है।
ऋग्वैदिक काल से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर | प्रारंभिक परीक्षा हेतु अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. ऋग्वैदिक काल क्या है और इसका भारतीय इतिहास में क्या महत्व है?
ऋग्वैदिक काल वैदिक युग का प्रारंभिक चरण माना जाता है। इस काल की जानकारी मुख्यतः Rigveda से प्राप्त होती है। भारतीय प्राचीन इतिहास में यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी समय प्रारंभिक सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचनाओं का विकास हुआ।
2. ऋग्वेद में कितने मंडल और कितने सूक्त हैं?
ऋग्वेद में १० मंडल और १०२८ सूक्त हैं। दूसरे से सातवें मंडल परिवार मंडल कहलाते हैं, जबकि नवाँ मंडल सोम देवता को समर्पित है।
3. ऋग्वैदिक काल में सबसे प्रमुख देवता कौन थे?
ऋग्वैदिक काल में Indra सबसे प्रमुख देवता माने जाते थे। उनके बाद Agni का महत्व था। इंद्र को युद्ध और वर्षा का देवता माना गया।
4. ऋग्वैदिक काल में वरुण देवता का क्या महत्व था?
Varuna को नैतिक व्यवस्था और ऋत का रक्षक माना जाता था। वे सत्य और अनुशासन से जुड़े देवता थे।
5. ऋग्वैदिक काल में यज्ञ का क्या महत्व था?
यज्ञ धार्मिक जीवन का केंद्र था। देवताओं को प्रसन्न करने, समृद्धि प्राप्त करने और सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए यज्ञ किए जाते थे।
6. ऋग्वैदिक काल में ऋत का क्या अर्थ था?
Ṛta का अर्थ ब्रह्मांडीय व्यवस्था या प्राकृतिक नियम से है। इसे धार्मिक और नैतिक जीवन का आधार माना जाता था।
7. ऋग्वैदिक समाज की प्रमुख इकाइयाँ कौन-कौन सी थीं?
सामाजिक संगठन क्रमशः कुल, ग्राम, विश और जन पर आधारित था। ग्राम का नेतृत्व ग्रामणी करता था।
8. ऋग्वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था कैसी थी?
वर्ण व्यवस्था प्रारंभिक अवस्था में लचीली थी। यह जन्म के आधार पर कठोर नहीं थी और कर्म आधारित स्वरूप अधिक दिखाई देता है।
9. ऋग्वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति कैसी थी?
स्त्रियों को शिक्षा, वैदिक मंत्रोच्चारण और धार्मिक कार्यों में भाग लेने का अधिकार प्राप्त था। Lopamudra जैसी विदुषी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है।
10. सभा और समिति में क्या अंतर था?
Sabha वरिष्ठ व्यक्तियों की संस्था थी, जबकि Samiti व्यापक जन भागीदारी वाली संस्था मानी जाती थी।
11. दाशराज्ञ युद्ध क्या था?
Battle of the Ten Kings दस राजाओं के बीच हुआ संघर्ष था जिसमें Sudas विजयी हुआ।
12. ऋग्वैदिक काल की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार क्या था?
मुख्य आधार पशुपालन था। गाय सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति मानी जाती थी।
13. ऋग्वैदिक काल में गाय का इतना महत्व क्यों था?
Cow धन, विनिमय, सामाजिक प्रतिष्ठा और यज्ञीय उपयोग का प्रमुख आधार थी।
14. ऋग्वैदिक काल की मुख्य फसल कौन सी थी?
मुख्य फसल Barley थी। कृषि का उल्लेख मिलता है परंतु पशुपालन अधिक महत्वपूर्ण था।
15. निष्क क्या था?
Nishka एक आभूषण था जिसका उपयोग मूल्य की इकाई के रूप में भी होता था।
16. अयस शब्द का अर्थ क्या है?
Ayas सामान्यतः ताम्र या कांस्य के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है, लोहा नहीं।
17. ऋग्वैदिक काल की सबसे महत्वपूर्ण नदी कौन थी?
Saraswati River को सबसे अधिक महत्व प्राप्त था।
18. सप्तसिंधु क्षेत्र क्या था?
यह वह क्षेत्र था जहाँ प्रारंभिक वैदिक आर्यों का प्रमुख निवास माना जाता है। इसमें अनेक नदियों का क्षेत्र शामिल था।
19. ऋग्वैदिक शिक्षा व्यवस्था कैसी थी?
Gurukul आधारित मौखिक शिक्षा पद्धति प्रचलित थी।
20. प्रारंभिक परीक्षा में ऋग्वैदिक काल से कौन से तथ्य सबसे अधिक पूछे जाते हैं?
देवता, नदियाँ, सभा-समिति, गाय, जौ, निष्क, अयस, वर्ण व्यवस्था, स्त्रियों की स्थिति और दाशराज्ञ युद्ध से प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं।


